Tuesday, February 3, 2009

ख़ालीपन

बीते लम्हों की कसक दे जाती है ,
वो एक झलकपुराने पन्ने पलटाती है
समय के साथ-साथ ,
समय मे हम कहाँ खड़े हैं?
देखें एक दूजे को,
खुद मे क्या देखना चाहते हैं?
एक ख़ालीपन है दरमियाँ ,
हम मे क्या महसूस होता है?
कुछ अनमोल है बंद मुट्ठी में,
रोज़ पाता , रोज़ खोता है

7 comments:

hemjyotsana said...

Bahut khoob
waiting for next

Preeti said...

nice one yaar.....
meaningful mam!!!!!!!

लाल और बवाल (जुगलबन्दी) said...

हिन्दी को अंतरजाल पर समृद्ध करने के लिए आपका यह प्रयास अति सराहनीय है. आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाऐं.

Abhishek said...

कुछ अनमोल है बंद मुट्ठी में,
रोज़ पाता , रोज़ खोता है

Sundar abhivyakti, Swagat.

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

bahut aacchi hai aapki rachnaa..........!!

रचना गौड़ ’भारती’ said...

सुंदर रचना
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
www.zindagilive08.blogspot.com
आर्ट के लि‌ए देखें
www.chitrasansar.blogspot.com

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