Friday, February 6, 2009

एक कोशिश

समेट रहे हैं बिखरे टुकड़ों को

कहीं कतरा छूट न जाए,

मूरत बनने से पहले ही

कहीं फिर टूट न जाए

नींद से न जगाना मुझे

ख्वाब पूरा नहीं हुआ,

एक पहर बाकी है

अभी सवेरा नहीं हुआ

भोर होने से पहले बस

एक कोशिश करनी है,

वो जिंदगी जो रूठी है

मुझे आज अपनी करनी है

4 comments:

Abhi said...

Swagat hai Iti Ji,
Kabhi yahan bhi aaye....
http://jabhi.blogspot.com

"VISHAL" said...

kafi gambheerta hai aapki rachnao me.

---------------------------------------"VISHAL"

विनय said...

काफ़ी अच्छी रचना है, मनोभावों का प्रकटन भी सुन्दरता से किया गया है।

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चाँद, बादल और शाम

hemjyotsana said...

koshish jarur kamayaab hogi

नींद से न जगाना मुझे
ख्वाब पूरा नहीं हुआ,
एक पहर बाकी है
अभी सवेरा नहीं हुआ .......... bahut achchi lagi ye pankiyan

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